श्री रुद्राष्टकम स्तोत्रम / रुद्रा सूक्त / शिव स्तोत्र/ तुलसीदास रचित शिव स्तोत्र ( नमामीशमीशान निर्वाणरूपम )
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श्री रुद्राष्टकम स्तोत्रम / रुद्रा सूक्त / शिव स्तोत्र
श्री रुद्राष्टकम
स्तोत्र तुलसीदास द्वारा भगवान शिव की स्तुति में रचित किया गया है इसका वर्णन
रामचरितमानस के उत्तरकांड में मिलता है| संसार के समस्त जन्म दुखो से मुक्ति पाने के लिए इसका पाठन
करना चाहिए|
भगवान शिव की सहस्त्रनामावली
में रूद्र को भगवान शिव का स्वरूप बताया गया है| रूद्र का मतलब है जो ‘सबसे
शक्तिशाली और पराक्रमी’ , ‘समस्याओ
को जड़ से मिटाने वाला’ सबसे गंभीर या गर्जना करने वाला’| शिव भगवान का शांत रूप है वहीं रूद्र भगवान शिव का क्रूर रूप है जो
मनुष्यों के फायदे के लिए संहार लेकर आता है क्योंकि जब कोई पुरानी चीज़ जड़ से खत्म
होती है तभी नई चीज़ का जन्म होता है| यह हमारे अंदर किसी भी
मोह का त्याग करने का प्रतीक है| यह सही और गलत निर्णय लेने की क्षमता को दर्शाता है| रूद्र भगवान अन्तरिक्ष में
स्थित वो बिंदु है जिसने स्वर्ग और नर्क दोनों का अनुभव किया है या हम कह सकते है
की यह ऐसे व्यक्ति का रूप है जिसने दोनों पक्षों (सही और गलत) को जिया हो| यह
समुन्द्र के बीच में एक लाइटहाउस की तरह है जो भटके/ जीवन से निराश लोगों को
मार्गदर्शन देता है|
इसीलिए जिंदगी जब भी हम किसी
बुरे दौर से गुजर रहे होते है तो रूद्र स्तोत्र का पाठ करना चाहिए| यह हमे जिस
चीज़ से हमारा मोह होता है उसका त्याग करने में मदद करता है क्योंकि खत्म होना
सृष्टी का नियम है और जब कोई पुरानी चीज़ खत्म होती तभी नई का जन्म होता है| भगवान शिव में श्रद्धा रखते हुए उनसे
प्रार्थना करनी चाहिए की जीवन आई चुनोतियो का हम डटकर सामना कर सके|
श्री रुद्राष्टकम स्तोत्र संस्कृत और हिंदी में
नमामी-शमीशान निर्वाण-रूपं । विभुं व्यापकं
ब्रह्मवेद-स्वरूपम् ॥
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं ।
चिदाकाश-माकाश-वासं भजे हं ।1।
अर्थ:- हे मोक्ष स्वरुप, सर्व्यवापी, ब्रह्म और वेद स्वरूप, ईशान दिशाके ईश्वर तथा सबके स्वामी श्री शिवजी, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निजस्वरुप में स्थित अर्थात माया आदि से रहित, गुणों से रहित, भेद रहित, इच्छा रहित, चेतन आकाशरूप एवं आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले दीगम्बर अर्थात आकाश को भी आच्छादित करने वाले, आपको मैं भजता हूँ |
निराकार-मोंकार-मूलं तुरीयं । गिरा ग्यान
गोतीत-मीशं गिरीशं ।
करालं महाकाल कालं कृपालं । गुणागार संसार-पारं
नतो हं ।2।
अर्थ:- कैलाशपति, ओंकार के मूल, तुरीय अर्थात तीनों गुणों से अतीत, वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलाशपति, विकराल, महाकाल के काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे, आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ |
तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं । मनोभूत कोटि
प्रभा श्री शरीरं ।
स्फुर-न्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा ।
लसद्भाल-बालेन्दु कण्ठे भुजंगा ।3।
अर्थ:- जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गंभीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिरपर सुन्दर गंगा जी नदी विराजमान हैं, जिनके ललाट पर द्वितीय का चन्द्रमा और गले में सर्प सुशोभित हैं |
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं ।
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालं ।।
मृगाधीश-चर्माम्बरं मुण्ड-मालं । प्रियं शंकरं
सर्वनाथं भजामि ।4।
अर्थ:- जिनके कानों में, कुण्डल हिल रहे हैं, सुन्दर भ्रुकुटी और विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्नमुख, नीलकंठ और दयालु हैं। सिंहचर्म का वस्त्र धारण किये और मुण्डमाला पहने हैं, सबके प्यारे और सबके नाथ, कल्याण करने वाले, श्री शंकर जी को मैं भजता हूँ |
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं । अखण्डं
अजं भानुकोटि-प्रकाशम् ।
त्रय: शूल निर्मूलनं शूल-पाणिं । भजे हं
भवानी-पतिं भाव-गम्यं ।5।
अर्थ:- प्रचंड (रुद्ररूप) श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखंड, अजन्मा, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों (दुखों) को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किये हुए, भाव (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होने वाले, भवानी के पति श्री शंकर जी को मैं भजता हूँ |
कलातीत कल्याण कल्पांत-कारी ।
सदा-सज्जनानन्द-दाता पुरारी ।
चिदानन्द संदोह मोहा-पहारी । प्रसीद प्रसीद
प्रभो मन्मथारी ।6।
अर्थ:- कलाओं से परे, कल्याण स्वरुप, कल्प का अंत (प्रलय) करने वाले, सज्जनों को सदा आनंद देने वाले, त्रिपुर के शत्रु, सच्चिदानन्दघन, मोह को हराने वाले, मन को मथ डालने वाले, कामदेव के शत्रु, हे प्रभु प्रसन्न होइये |
न यावद् उमानाथ पादा-रविंदं । भजंतीह लोके परे
वा नराणां ।
न तावत्सुखं शान्ति सन्ताप-नाशं । प्रसीद प्रभो
सर्व-भूताधि-वासं ।7।
अर्थ:- जब तक पार्वती के पति (शंकरजी) आपके चरणकमलों को मनुष्य नहीं भजते, तबतक उन्हें न तो इसलोक में ओर ना ही परलोक में सुख-शान्ति मिलती है और न उनके तापों का नाश होता है। अत: हे समस्त जीवों के अन्दर (हृदय में) निवास करनेवाले प्रभो, प्रसन्न होइये |
न जानामि योगं जपं नैव पूजां । नतो हं सदा
सर्वदा शम्भु तुभ्यं ।
जरा-जन्म दु:खौघ तातप्य-मानं । प्रभो पाहि
आपन्न्मामीश शंभो ।8।
अर्थ:- मैं न तो योग जानता
हूँ,
न जप और पूजा ही। हे शम्भो, मैं
तो सदा-सर्वदा आपको ही
नमस्कार करता हूँ। हे प्रभु, बुढापा तथा जन्म और मृत्यु के दुःख समूहों से जलते हुए
मुझ दुखी की दुःख में रक्षा कीजिये। हे ईश्वर, हे
शम्भो,
मैं आपको नमस्कार करता हूँ |
रुद्राष्टक-मिदं प्रोक्तं विप्रेण हर-तोषये । ये पठन्ति नरा भक्तया तेषां शम्भु: प्रसीदति ॥
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